
पटियाला, 16 अप्रैल
“हमारी लोक खेलें केवल शारीरिक गतिविधियाँ नहीं हैं, बल्कि यह हमारे इतिहास की जीवंत धरोहर हैं। ये खेलें पंजाबी मानसिकता की ‘चढ़दी कला’ का प्रतीक हैं। इन्हें संजोना और प्रोत्साहित करना हमारी आवश्यकता है।” यह विचार ‘द महाराजा भूपिंदर सिंह पंजाब स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी’ के उपकुलपति प्रो. पुष्पिंदर सिंह गिल ने पंजाब की लोक खेलों पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किए।
बारादरी स्थित प्रभात परवाना मेमोरियल ट्रेड यूनियन सेंटर में आयोजित इस सेमिनार के दौरान वीसी प्रो. गिल ने कहा कि भले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत आधुनिक खेल वैश्विक पहचान के लिए जरूरी हैं, लेकिन हमारी स्थानीय लोक खेलें वह बुनियादी ताकत और सामुदायिक एकता प्रदान करती हैं, जिसकी बराबरी कोई भी आधुनिक खेल नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि पंजाब सरकार द्वारा मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में किला रायपुर में बैलगाड़ियों की दौड़ को फिर से शुरू करना एक सराहनीय और विरासत खेलों को बढ़ावा देने वाला कदम है।
उपकुलपति ने कहा कि इन खेलों को अकादमिक पाठ्यक्रम का औपचारिक हिस्सा बनाने के लिए भी कार्य किया जाएगा, ताकि पंजाब के किसी भी गाँव का बच्चा ‘गतका’ सीखने में उतना ही गर्व महसूस करे, जितना वह किसी ओलंपिक खेल में करता है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि इन खेलों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए संस्थागत स्तर पर कई कदम उठाने की आवश्यकता है।
हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. मनमोहन सिंह ने मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कहा कि लोक खेलें हमें अपनी मिट्टी से जोड़ती हैं। उन्होंने कहा कि खेल केवल जीतने के लिए नहीं, बल्कि सीखने के लिए होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जहां आधुनिक संगठित खेल जटिल और महंगे होते जा रहे हैं, वहीं हमारी लोक खेलें आज भी सरल, सस्ती और प्रभावी हैं।
डॉ. गुरभजन गिल ने सेमिनार की विशिष्ट शख्सियत के रूप में भाग लेते हुए कहा कि आज जब एआई का प्रभाव बढ़ रहा है और वैश्वीकरण ने मानव जीवन पर गहरा असर डाला है, तब हमें लोक खेलों सहित अपने समग्र विरासत को प्राथमिकता के आधार पर संरक्षित करना होगा।
उन्होंने कहा कि पंजाब को नशा मुक्त बनाने के लिए यहाँ अच्छी खेल संस्कृति विकसित करना आवश्यक है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पूंजीवाद की अंधी दौड़ ने हमसे हमारी सुंदर लोक खेलें छीन ली हैं, जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पंजाब की हर मर्यादा को बचाने के लिए एकजुट प्रयास जरूरी हैं।
प्रसिद्ध लोकधारा विशेषज्ञ डॉ. गुरमीत सिंह ने अपने मुख्य भाषण में कहा कि लोक खेलें हमें शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने विस्तार से बताया कि लोक खेलों में प्रचलित गतिविधियाँ, संकेत, हाव-भाव और शब्दावली के गहरे अर्थ होते हैं, जो मानव के अवचेतन से जुड़े भावों को व्यक्त करते हैं। उन्होंने कहा कि आज की आधुनिक खेलों की जड़ें भी हमारे गाँवों में खेले जाने वाली कई लोक खेलों में निहित हैं।
उद्घाटन सत्र का संचालन सेमिनार की संयोजक डॉ. मनप्रीत कौर ने किया तथा विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार कर्नल परमिंदर सिंह गिल ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
उद्घाटन सत्र के बाद आयोजित पैनल चर्चा में प्रो. सुरजीत सिंह भट्टी, डॉ. हरजीत कौर तथा सूचना एवं लोक संपर्क विभाग के डिप्टी डायरेक्टर एवं खेल लेखक नवदीप सिंह गिल ने अपने विचार साझा किए। नवदीप सिंह गिल ने कहा कि पंजाब में खेलों और खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए पारंपरिक खेलों को साथ लेकर चलना जरूरी है, तभी वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक युग में हमारे खिलाड़ी सफल हो सकते हैं। उन्होंने सिख इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि खेलों में उत्कृष्टता हासिल करने का जज़्बा पंजाबियों के खून में है। इस सत्र का संचालन डॉ. अमरीक सिंह ने किया।
इसके बाद विभिन्न शोधार्थियों ने पंजाब की लोक खेलों पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। उन्होंने पंजाब के इतिहास, संस्कृति, लोक खेलों के वर्गीकरण, उनके इतिहास तथा स्कूलों और विश्वविद्यालयों में लोक खेलों को पाठ्यक्रम में शामिल करने जैसे विषयों पर अपने विचार रखे। अंत में समापन सत्र का संचालन डॉ. सनमान कौर ने किया।
सेमिनार के दौरान अन्य प्रमुख उपस्थितियों में डॉ. सुरजीत सिंह, डॉ. गुरमुख सिंह, डॉ. सतीश कुमार वर्मा, डॉ. राजिंदरपाल सिंह बराड़, डॉ. मान सिंह ढींढसा, डॉ. परमवीर सिंह, डॉ. अमरजीत सिंह, डॉ. किरणजीत कौर आदि शामिल रहे।
